आज तेरे घर के आगे से गुज़रा

आज तेरे घर के आगे से गुज़रा
यूँ तो वहां से गुज़ारना कोई अनोखी बात नहीं थी
पर उस एहसास को महसूस करना कोई इत्तेफ़ाक़ भी नहीं
वही डर कि कोई देख तो नहीं रहा
वही बदन के रौंगटे खड़े हो जाना
वही दिल का ज़ोर ज़ोर से धड़कना
वही पेट में तितलियों का उड़ना
वही अजीब सी ख़ुशी का स्पर्श
और वही धीमी सी मुस्कराहट
सब कुछ बिलकुल वही
मनो एक पल में ही सात साल पीछे चला गया मैं
मैं जनता हूँ कि तू वहाँ नहीं थी
तेरी खुशबू भी नहीं थी उस हवा में
ना तेरी आवाज़ की कोई गूँज
ना कोई निशान
फिर भी तेरे दरवाज़े की तरफ देखा हर बार की तरह
कोई उम्मीद नहीं कोई चाह नहीं
नजाने क्यूँ फिर भी कह दिआ दिल ने
की काश…तेरी एक झलक मिल पाती!

||||| 7 Like |||||